रुचिका को न्याय बनाम भारत में
नमस्कार !
हालचाल ठीक है ?
आजकल चर्चे में बहुत सी बातें हैं। उनमें से एक है रुचिका गिरिहोत्रा का केस। मीडिया, संसद और सड़क सब जगह चर्चे हैं। १९ वर्षों के बाद एक सेवानिवृत्त आईपीएस को सजा हो गई है। सजा तभी हुई जब अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए तथा उनको चाहने वाले नेता इस समय सरकार में नहीं हैं। अधिकारी महोदय ने एक १२ वर्षीया खलाड़ी के साथ बदसलूकी की। थाने में प्राथमिकी लिखाने के प्राथमिक प्रयास असफल रहे। क्योंकि तत्कालीन गृहमंत्री तथा मुख्यमंत्री ने अनुमति नहीं दी। बाद में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से सीबीआई केजांच के बाद मुकदमा शुरू हुआ।
इसमें दो बाते और उल्लेखनीय हैं एक तो यह की घरवालों पर दबाव बनाने के लिए रुचिका के भाई को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा गया। इसी दौरान रुचिका ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद उसके भाई को छोड़ दिया गया। इस प्रकरण से सम्बंधित बहुत सी बाते अब अखबारों में छप रहीं हैं।
प्रश्न उठता है कि घटना के ठीक बाद इतना ही हल्ला क्यों नहीं मचाया गया। क्या उस समय मीडिया भी दबाव में थी? लगता तो यही है.
दूसरा प्रश्न है कि क्या यदि अधिकारी महोदय को सजा नहीं मिली होती तो भी इतना ही हल्ला मचता ? शायद कुछ नहीं होता। हल्ला तो इस लिए मच गया कि सजा कम थी।
तीसरा प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय कानून के समक्ष सभी लोग एक सामान हैं? यदि सामान होते तो तत्काल प्राथमिकी लिखी जाती और उस केस की विवेचना एक उच्च अधिकारी को दी जाती।
चौथा प्रश्न क्या दिन रात मंच से जनता की सेवा करने वाले लोगों को कुछ भी करने में शर्म नहीं आती?
किसी भी केस के फैसले में अधिकतम कितने दिन लगने चाहिए यह तय हो जाना चाहिए। न्यायपालिका के पास अब शोध अनुभाग भी होना चाहिए जिससे त्वरित न्याय की सुबिधा को बढाया जा सके। एक तय सीमा समाप्त हो जाने के बाद उस केस की सुनवाई लगातार होनी चाहिए तथा फैसला आना चाहिए।
न्यायालयों की संख्या तथा न्यायाधीशों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए। खेद का विषता है कि भारत में जनसंख्या के अनुपात में सभी विभागों में अधिकारियों की कमी है। कुछ दिनों पहले तक खर्चा सरकारी खर्च घटाओ का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इसके नाम पर सभी विभागों में कार्मिकों की भारती पर रोक लगा दी गयी। आई यम यफ कराप्रवंचन पर कोई राय नहीं देता है। माननीय राजीव गांधी जी बोल गए की सरकार का ९० प्रतिशत धन हवा में उड़ जाता है। उन्होंने भी इस पर कोई बात नहीं की कि जनता की जेब से जो कर व्यापारियों के माध्यम से सर कार को जाता है उसमें से कितना हवा में उड़ जाता है.
क्या इस समय यह उठा हवा शोर भारत में प्रभावी सरकार अर्थात,कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका में सुधार में कुछ योगदान कर सकेगा?
मीडिया जगी रहे और जगाती रहे।
नमस्कार।
हालचाल ठीक है ?
आजकल चर्चे में बहुत सी बातें हैं। उनमें से एक है रुचिका गिरिहोत्रा का केस। मीडिया, संसद और सड़क सब जगह चर्चे हैं। १९ वर्षों के बाद एक सेवानिवृत्त आईपीएस को सजा हो गई है। सजा तभी हुई जब अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए तथा उनको चाहने वाले नेता इस समय सरकार में नहीं हैं। अधिकारी महोदय ने एक १२ वर्षीया खलाड़ी के साथ बदसलूकी की। थाने में प्राथमिकी लिखाने के प्राथमिक प्रयास असफल रहे। क्योंकि तत्कालीन गृहमंत्री तथा मुख्यमंत्री ने अनुमति नहीं दी। बाद में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से सीबीआई केजांच के बाद मुकदमा शुरू हुआ।
इसमें दो बाते और उल्लेखनीय हैं एक तो यह की घरवालों पर दबाव बनाने के लिए रुचिका के भाई को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा गया। इसी दौरान रुचिका ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद उसके भाई को छोड़ दिया गया। इस प्रकरण से सम्बंधित बहुत सी बाते अब अखबारों में छप रहीं हैं।
प्रश्न उठता है कि घटना के ठीक बाद इतना ही हल्ला क्यों नहीं मचाया गया। क्या उस समय मीडिया भी दबाव में थी? लगता तो यही है.
दूसरा प्रश्न है कि क्या यदि अधिकारी महोदय को सजा नहीं मिली होती तो भी इतना ही हल्ला मचता ? शायद कुछ नहीं होता। हल्ला तो इस लिए मच गया कि सजा कम थी।
तीसरा प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय कानून के समक्ष सभी लोग एक सामान हैं? यदि सामान होते तो तत्काल प्राथमिकी लिखी जाती और उस केस की विवेचना एक उच्च अधिकारी को दी जाती।
चौथा प्रश्न क्या दिन रात मंच से जनता की सेवा करने वाले लोगों को कुछ भी करने में शर्म नहीं आती?
किसी भी केस के फैसले में अधिकतम कितने दिन लगने चाहिए यह तय हो जाना चाहिए। न्यायपालिका के पास अब शोध अनुभाग भी होना चाहिए जिससे त्वरित न्याय की सुबिधा को बढाया जा सके। एक तय सीमा समाप्त हो जाने के बाद उस केस की सुनवाई लगातार होनी चाहिए तथा फैसला आना चाहिए।
न्यायालयों की संख्या तथा न्यायाधीशों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए। खेद का विषता है कि भारत में जनसंख्या के अनुपात में सभी विभागों में अधिकारियों की कमी है। कुछ दिनों पहले तक खर्चा सरकारी खर्च घटाओ का नारा बुलंद किया जाता रहा है। इसके नाम पर सभी विभागों में कार्मिकों की भारती पर रोक लगा दी गयी। आई यम यफ कराप्रवंचन पर कोई राय नहीं देता है। माननीय राजीव गांधी जी बोल गए की सरकार का ९० प्रतिशत धन हवा में उड़ जाता है। उन्होंने भी इस पर कोई बात नहीं की कि जनता की जेब से जो कर व्यापारियों के माध्यम से सर कार को जाता है उसमें से कितना हवा में उड़ जाता है.
क्या इस समय यह उठा हवा शोर भारत में प्रभावी सरकार अर्थात,कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका में सुधार में कुछ योगदान कर सकेगा?
मीडिया जगी रहे और जगाती रहे।
नमस्कार।
मीडिया का जगना वाकई जरुरी है.
ReplyDeleteगांधी पहेली